शाहपुर में लोक संस्कृति के रंगों के बीच मधुबनी नाट्य महोत्सव का आगाज
तीन दिनों तक सजेगा कला और रंगमंच का मंच, पहले दिन कवि सम्मेलन व संगोष्ठी में लोक परंपराओं को लेकर हुई चर्चा

सकरी, 21 सितंबर 2026। मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और रंगमंचीय चेतना को समर्पित तीन दिवसीय मधुबनी नाट्य महोत्सव की शुरुआत सोमवार को पंडौल प्रखंड के शाहपुर में हुई। दीप प्रज्वलन के साथ आरंभ हुए इस आयोजन में जनप्रतिनिधियों, साहित्यकारों, कलाकारों और कला प्रेमियों की मौजूदगी रही। उद्घाटन के अवसर पर स्थानीय नगर विधायक माधव आनंद, संतोष झा, स्थानीय प्रतिनिधि गोपाल झा, फिल्म अभिनेता अर्जुन राय तथा आयोजन संस्था के अध्यक्ष रवि रंजन कुमार ने संयुक्त रूप से कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में आयोजन समिति की ओर से आमंत्रित अतिथियों और कवियों का मिथिला की पारंपरिक विधि से अभिनंदन किया गया। उन्हें पाग और दुपट्टा पहनाने के साथ स्मृति चिह्न प्रदान किए गए। सम्मान समारोह के जरिए आयोजनकर्ताओं ने मिथिला की परंपरागत आतिथ्य संस्कृति और सांस्कृतिक पहचान को भी सामने रखा।
इस महोत्सव का आयोजन आदर्श महिला मंडल, लडूगामा के तत्वावधान में किया जा रहा है। सांस्कृतिक कार्य निदेशालय, कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार सरकार के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम का केंद्र बिंदु लोक कलाओं और नाट्य परंपराओं को संरक्षण प्रदान करना तथा उन्हें नई पीढ़ी से जोड़ना है। आयोजकों के अनुसार ऐसे मंच स्थानीय कलाकारों और रचनाकारों को अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करने का अवसर देने के साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने में भी सहायक होते हैं।
सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने पर जोर
उद्घाटन समारोह में विधायक माधव आनंद ने मिथिला की सांस्कृतिक परंपराओं की व्यापकता का उल्लेख करते हुए कहा कि लोक कला किसी समाज के जीवन, इतिहास और सामाजिक अनुभवों का जीवंत दस्तावेज होती है। उन्होंने कहा कि गीत, नृत्य, नाटक और साहित्य के माध्यम से एक पीढ़ी अपने अनुभव दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाती है। मधुबनी नाट्य महोत्सव इसी सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखने की दिशा में एक प्रयास है।

हास्य-व्यंग्य और काव्य पाठ ने बांधे श्रोता
महोत्सव के प्रथम दिन फिल्म अभिनेता अर्जुन राय के निर्देशन में कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। मंच पर विभिन्न रचनाकारों ने अपनी कविताओं और गजलों की प्रस्तुति दी। हास्य और व्यंग्य से जुड़ी रचनाओं पर दर्शकों की खूब प्रतिक्रिया देखने को मिली। कार्यक्रम के दौरान कई मौकों पर श्रोताओं की हंसी और तालियों से पूरा परिसर गूंज उठा।
कवि सम्मेलन में कमलेश प्रमेंद्र, दीपक सर, बंशीधर मिश्रा, आनंद मोहन झा, शारदा झा, मालती मिश्रा, सुनाम जस्टि, डॉ. अवधेश नारायण झा और शक्ति ठाकुर ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। कविता और गजल की विविध प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को साहित्यिक रंग प्रदान किया।
लोक नाट्य की भूमिका पर हुआ विमर्श
पहले दिन आयोजित संगोष्ठी में ‘लोक कला एवं लोक नाट्य का संरक्षण’ विषय को केंद्र में रखकर चर्चा की गई। मुख्य वक्ता डॉ. अवधेश झा ने कहा कि भारतीय समाज में नाट्य परंपरा का इतिहास काफी पुराना है। रंगमंच मनोरंजन के साथ सामाजिक संवाद का भी प्रभावी माध्यम रहा है। इसके जरिए समाज की परिस्थितियों, मान्यताओं, परंपराओं और समस्याओं को अभिव्यक्ति मिलती है।

उन्होंने कहा कि नाटक किसी विषय को केवल शब्दों के माध्यम से नहीं रखता, बल्कि पात्रों और अभिनय के जरिए उसे दर्शकों के सामने जीवंत कर देता है। इसी वजह से सामाजिक चेतना के निर्माण में नाट्य विधा की महत्वपूर्ण भूमिका है।
शैलेश कुमार ने लोक नाट्य के स्वरूप और उसके सामाजिक आधार पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसकी विषयवस्तु आम जनजीवन से निकलती है। गांवों की जीवनशैली, सामाजिक संबंध, धार्मिक विश्वास, स्थानीय परंपराएं और जनभावनाएं लोक नाट्य की कथाओं में दिखाई देती हैं। गीत, संगीत, संवाद और नृत्य इसके प्रस्तुतीकरण को प्रभावशाली बनाते हैं। उन्होंने लोक नाट्य की सहजता और स्थानीय परिवेश से उसके जुड़ाव को इसकी प्रमुख विशेषता बताया।
संगोष्ठी में इंद्रा भूषण रमन बमबम, जटाधार पासवान और रानी झा ने भी अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम में निशात कुमार और सुमन सहित अन्य कलाकारों की सहभागिता रही। मंच संचालन और उद्घोषणा की जिम्मेदारी शारदा झा तथा आनंद मोहन झा ने संभाली।
महोत्सव के अगले दो दिनों में भी विभिन्न सांस्कृतिक एवं नाट्य प्रस्तुतियों के आयोजन की तैयारी है। आयोजन को लेकर क्षेत्र के कला एवं संस्कृति प्रेमियों में उत्साह बना हुआ है।



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