लोकगीतों की थिरकन से सजा मधुबनी नाट्य महोत्सव, ‘विद्यापति’ के मंचन ने छोड़ी अमिट छाप
रिपोर्ट: सीतेश चौधरी
मधुबनी। आदर्श महिला मंडल, लड्डूगामा के तत्वावधान तथा सांस्कृतिक कार्य निदेशालय, कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार सरकार के प्रायोजन में आयोजित तीन दिवसीय मधुबनी नाट्य महोत्सव के दूसरे दिन मंच पर मिथिला की लोक परंपरा, देशज संगीत और रंगमंचीय प्रस्तुति का आकर्षक संगम देखने को मिला। कार्यक्रम के पहले सत्र में श्री रवि रंजन कुमार के निर्देशन में कलाकारों ने विभिन्न लोकगीतों एवं लोकनृत्यों की प्रस्तुति देकर वातावरण को पूरी तरह लोक रंग में रंग दिया।

कार्यक्रम का आरंभ नेपाली झिझिया की सामूहिक प्रस्तुति से हुआ। श्वेता, निशा और जान्हवी ने अपनी प्रस्तुति से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद आदित्य, आलोक, जय, श्वेता, निशा और जान्हवी ने ‘लाल साड़ी में सजनी कमाल लगई छी’ पर सामूहिक नृत्य प्रस्तुत किया। ‘एते के झुमका नई लेबई, दरभंगा से मांगा दिए’, मैथिली कजरी ‘कइसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरी आइल ननदी’ और सामा-चकेवा गीत ‘गगन के अधिकारी तोहे बड़का भैया हो’ जैसी प्रस्तुतियों में मिथिला की पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाई दी।
लोक प्रस्तुतियों की श्रृंखला में भोजपुरी झिझिया, राजस्थानी लोकगीत, डोमकच और विभिन्न सामूहिक एवं युगल नृत्यों ने भी दर्शकों को खूब आकर्षित किया। राखी ने ‘हमार दूल्हा हो हमार दूल्हा’ पर एकल प्रस्तुति दी। प्राची ने शारदा सिन्हा के लोकप्रिय लोकगीत ‘पिया लेले आइहा हो पिया झुमका बंगाल से’ की प्रस्तुति से माहौल को भावपूर्ण बनाया। वहीं अर्चना ने ‘घर आजा परदेशी’ पर एकल प्रस्तुति दी। श्वेता, निशा और जान्हवी ने हिंदी गीत ‘बड़ी मुश्किल बाबा बड़ी मुश्किल’ पर सामूहिक नृत्य प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के अंतिम चरण में जय कुमार ने हिंदी रैप की एकल प्रस्तुति दी।
दूसरे सत्र में डॉ. ईशनाथ झा द्वारा लिखित नाटक ‘विद्यापति’ का मंचन किया गया। नाटक के माध्यम से मिथिला के महान कवि विद्यापति और भगवान शिव के बीच भक्ति, विश्वास तथा समर्पण के अद्भुत संबंध को मंच पर जीवंत किया गया। कथानक में मिथिला के राजा शिवसिंह का मुगल शासक द्वारा बंदी बनाया जाना और विद्यापति के प्रयास से उनकी मुक्ति, कथा को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रदान करता है।

नाटक में भगवान शिव अपने भक्त विद्यापति की भक्ति से प्रभावित होकर ‘उगना’ नामक सामान्य सेवक के रूप में उनके साथ रहने लगते हैं। यात्रा के दौरान विद्यापति को प्यास लगने पर उगना अपनी जटा से गंगाजल निकालकर उनकी प्यास बुझाते हैं। बाद में विद्यापति को उगना के वास्तविक स्वरूप का आभास हो जाता है। एक अन्य प्रसंग में विद्यापति की पत्नी सुशीला के हाथों उगना को चोट लगने के बाद भगवान शिव का दिव्य स्वरूप सामने आता है। शिव विद्यापति से अपना रहस्य किसी को न बताने का वचन लेते हैं। लेकिन जब उगना पर झूठा आरोप लगाकर भीड़ विद्यापति को घेर लेती है, तब परिस्थितिवश विद्यापति को उगना के वास्तविक रूप का रहस्य बताना पड़ता है और भगवान शिव अंतर्ध्यान हो जाते हैं।
उगना की भूमिका रेमो पांडेय, महादेव की भूमिका जय कुमार तथा विद्यापति की भूमिका अविनाश झा ने निभाई। पार्वती के रूप में राखी, रामा के रूप में मिथिलेश, मुगल राजा के रूप में राहुल झा, क्रोध के रूप में आलोक, सुधीरा के रूप में दिव्या, महारानी के रूप में प्राची, दरबारी के रूप में विजय एवं बादल तथा राजा शिवसिंह की भूमिका राहुल चौधरी ने निभाई।
मंच की प्रकाश परिकल्पना रौशन कुमार ने की, जबकि संगीत संयोजन सुमन कुमार का रहा। मेकअप एवं वेशभूषा की जिम्मेदारी अर्जुन ने संभाली और कैमरा संचालन साहिल ने किया। कार्यक्रम का मंच संचालन शारदा झा ने किया। नाटक का रूपांतरण, परिकल्पना एवं निर्देशन रवि रंजन ने किया। दूसरे दिन की प्रस्तुतियों ने महोत्सव में लोक संस्कृति और रंगमंच के बीच एक प्रभावशाली सेतु स्थापित किया।



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