जब विचारधारा घर की चौखट पार कर जाए
व्यंग्यकार: सीतेश चौधरी
कभी-कभी लगता है कि विचारधारा भी बड़ी अजीब चीज है। आदमी इसे अपनाता है दुनिया बदलने के लिए, लेकिन पता नहीं कब वही विचारधारा उसके अपने घर की दीवारों में दरार डालने लगती है।
पियूष मिश्रा का वह इंटरव्यू याद आता है, जिसमें उन्होंने अपने जीवन के उस दौर को याद किया था जब एक विचारधारा के प्रभाव ने उन्हें अपने माता-पिता से इतना दूर कर दिया कि परिवार की जिम्मेदारियां भी बोझ जैसी महसूस होने लगी थीं। उनकी बातों में मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित उनकी विचारधारा नहीं, बल्कि बाद का पछतावा लगा।
पछतावा बड़ा निर्दयी शिक्षक होता है।
वह उस समय आता है जब क्रांति का शोर शांत हो चुका होता है और आदमी को अपने पीछे छूटे रिश्तों की आवाज सुनाई देती है।
युवा उम्र में हमें लगता है कि हम दुनिया को समझ चुके हैं। हमें लगता है कि हमारी किताबें पूरी दुनिया से ज्यादा बुद्धिमान हैं और हमारे तर्कों के सामने माता-पिता की पूरी जिंदगी का अनुभव भी पुराना संस्करण है।
मां-बाप कहते हैं—“बेटा, खाना खा ले।”
और हम मन ही मन सोचते हैं—“आपको क्या पता, मैं व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष कर रहा हूं!”
मां को बस इतना पता है कि बेटा भूखा है।
पिता को बस इतना पता है कि बेटा देर रात घर नहीं आया।
लेकिन बेटा इतिहास बदलने में व्यस्त है।
आज की नई राजनीतिक पीढ़ी को देखकर कभी-कभी लगता है कि हमने असहमति को संवाद से निकालकर पहचान बना लिया है। परिवार में विचार अलग हुआ नहीं कि रिश्ते भी वैचारिक खेमों में बंट गए।
पिता की राय अलग है?
सामंती सोच!
मां को राजनीति समझ नहीं आती?
पुरानी मानसिकता!
भाई दूसरे दल का समर्थक है?
परिवार में वैचारिक संकट!
और अगर कोई युवा सार्वजनिक रूप से यह कह दे कि उसके माता-पिता उससे राजनीतिक रूप से असहमत हैं, तो सोशल मीडिया तुरंत उसे क्रांतिकारी प्रमाणपत्र देने को तैयार हो जाता है।
मैं यहां किसी व्यक्ति के निजी जीवन पर फैसला नहीं सुना रहा। सार्वजनिक रूप से सामने आने वाले प्रसंगों को देखकर बस इतना सोच रहा हूं कि क्या किसी विचारधारा की मजबूती का प्रमाण अपने ही परिवार से दूरी बना लेना है?
अगर पिता दस साल बात नहीं करते, तो क्या विचारधारा जीत गई?
या एक रिश्ता हार गया?
यह सवाल किसी एक राजनीतिक धड़े के लिए नहीं है। हर विचारधारा के कट्टर अनुयायी के लिए है।
धर्म के नाम पर रिश्ते तोड़ना गलत है।
जाति के नाम पर रिश्ते तोड़ना गलत है।
राजनीति के नाम पर रिश्ते तोड़ना भी उतना ही गलत है।
क्योंकि विचार आदमी के लिए बने हैं, आदमी विचारों के लिए नहीं।
आज सोशल मीडिया ने क्रांति को बहुत आसान बना दिया है। एक तस्वीर, दो नारे, तीन हैशटैग और आदमी स्वयं को इतिहास की निर्णायक शक्ति समझने लगता है।
लेकिन इतिहास बदलने से पहले कभी घर लौटकर देखिए।
वह बूढ़ा पिता अब भी वहीं बैठा हो सकता है।
वह मां अब भी दरवाजे की आहट पहचान सकती है।
उन्हें आपकी विचारधारा नहीं चाहिए।
उन्हें बस उनका बेटा चाहिए।
और शायद यही वह जगह है जहां सबसे बड़ी वैचारिक परीक्षा शुरू होती है—क्या हम अपने विरोधी से असहमत रहते हुए भी उससे प्रेम कर सकते हैं?
अगर नहीं, तो हमारी लड़ाई व्यवस्था से कम और अपने भीतर से ज्यादा है।
और अंत में,
दुनिया बदलने निकलिए, जरूर निकलिए।
लेकिन घर का दरवाजा बंद करके नहीं।
क्योंकि क्रांति के लिए पूरी जिंदगी पड़ी है, मगर मां-बाप के साथ बिताया समय दोबारा नहीं मिलता।
बाकी विचारधारा अपनी जगह।
रिश्ते अपनी जगह।
और जब दोनों में चुनाव करना पड़े, तो कम से कम इतना याद रखिए—
इतिहास शायद आपके भाषण को भूल जाए, लेकिन आपके बूढ़े पिता को आपका फोन न करना जिंदगी भर याद रह सकता है।
लिखते रहेंगे….सीतेश चौधरी



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