भारत ने साफ कर दिया अपना रुख, अब दुनिया को नए शक्ति संतुलन के लिए तैयार रहना होगा
अमेरिका का दबाव और भारत की स्वतंत्र राह
विश्व राजनीति तेजी से बदल रही है। पुराने शक्ति समीकरण टूट रहे हैं। नई शक्तियाँ अपना प्रभाव बढ़ा रही हैं। ऐसे समय में भारत ने यह संकेत साफ कर दिया है कि उसकी विदेश नीति किसी दूसरे देश की इच्छा से नहीं चलेगी।
रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर अमेरिका के दबाव के बावजूद भारत ने अपने राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी। यह फैसला केवल ऊर्जा जरूरतों से जुड़ा नहीं है। इसके पीछे भारत की स्वतंत्र निर्णय क्षमता का बड़ा प्रश्न है।
भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। तेल की कीमत बढ़ने का असर परिवहन से लेकर उद्योग और आम परिवारों तक पहुँचता है। इसलिए भारत ऐसे स्रोतों की तलाश करता रहेगा, जहाँ उसे आर्थिक और रणनीतिक लाभ मिले।
संबंधों में मतभेद, लेकिन साझेदारी कायम
भारत और अमेरिका के संबंध आज व्यापक हैं। रक्षा, व्यापार, तकनीक और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों के हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में किसी एक मुद्दे पर मतभेद को पूरे संबंधों का संकट मानना सही नहीं होगा।
अमेरिका अपने हितों के अनुसार दबाव बनाएगा। भारत भी अपने हितों के अनुसार निर्णय लेगा। यही परिपक्व कूटनीति है।
भारत अब किसी एक शक्ति के सहारे अपनी विदेश नीति नहीं चलाना चाहता। रूस के साथ संबंध अपनी जगह हैं। अमेरिका के साथ साझेदारी का अपना महत्व है। यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और पश्चिम एशिया के देशों के साथ भी भारत अपने संबंधों को लगातार मजबूत कर रहा है।
बदलते समीकरणों पर भारत की नजर
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच बढ़ता सहयोग भी क्षेत्रीय राजनीति में नई चर्चा पैदा कर रहा है। इनके बीच रक्षा और सुरक्षा संबंधों की बढ़ती निकटता को भारत नजरअंदाज नहीं कर सकता।
लेकिन भारत के लिए घबराने की जरूरत भी नहीं है।
कूटनीति में हर समझौता तुरंत किसी नए मोर्चे का संकेत नहीं होता। उसकी असली दिशा समय के साथ सामने आती है। भारत को भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय अपनी आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक क्षमता बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।
असली ताकत आत्मनिर्भर क्षमता में है
भारत की सबसे बड़ी चुनौती किसी एक देश का दबाव नहीं है। असली चुनौती अपनी राष्ट्रीय शक्ति को इतना मजबूत बनाना है कि कोई भी शक्ति भारत के हितों की अनदेखी न कर सके।
इसके लिए मजबूत अर्थव्यवस्था चाहिए। ऊर्जा के अनेक स्रोत चाहिए। आधुनिक रक्षा क्षमता चाहिए। तकनीकी आत्मनिर्भरता चाहिए। वैश्विक व्यापार में बड़ी हिस्सेदारी चाहिए।
क्योंकि आने वाले समय में केवल हथियारों से शक्ति तय नहीं होगी। तकनीक, अर्थव्यवस्था, ऊर्जा और ज्ञान भी उतने ही निर्णायक होंगे।
भारत के सामने ऐतिहासिक अवसर
आज भारत के पास अपनी वैश्विक भूमिका को नए स्तर पर ले जाने का अवसर है। अमेरिका को भारत की जरूरत है। रूस भारत के साथ अपने संबंध बनाए रखना चाहता है। पश्चिम एशिया भारत को महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार मानता है। हिंद-प्रशांत में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
इसलिए भारत को किसी एक खेमे में सीमित होने के बजाय अपने विकल्प खुले रखने होंगे।
भारत की शक्ति उसकी इसी स्वतंत्रता में है।
अंततः सवाल यह नहीं है कि अमेरिका भारत पर कितना दबाव डाल सकता है। असली सवाल यह है कि भारत अपनी आर्थिक और सामरिक क्षमता कितनी तेजी से बढ़ाता है।
यदि भारत अपनी क्षमता को लगातार मजबूत करता रहा, तो वह केवल किसी शक्ति का साझेदार नहीं रहेगा। वह स्वयं विश्व शक्ति संतुलन का एक प्रमुख आधार बन सकता है।
यही बदलते विश्व में भारत की सबसे बड़ी संभावना है।



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